पहले बहुत बोलती थी, न जाने क्यों ख़ामोश रहने लगी हूँ।।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!बहुत खुश रहती हूं बाहर से,न जाने क्यों अंदर ही अंदर घुटने लगी हूं।।
कभी कहानियां हुआ करती थी जिंदगी की बातें।।
न जाने क्यों अब इन्हें महसूस करने लगी हूं।।
पहले थोड़ा सुन कर बहुत सुना दिया करती थी।।
न जाने क्यों अब ग़लत सुनकर भी ख़ामोश रहने लगी हूं।।
सोच में पड़ जाती हूं अक्सर जिंदगी की असलियत देखकर।।
न जाने क्यों अब असमंजस में रहने लगी हूं।।
त्यौहारों पर पहले बहुत उल्लास हुआ करता था।।
न जाने क्यों अब जिम्मेदारियों में बंध कर रहने लगी हूं।।
तजुर्बे भी बहुत हो गए और जीने के तरीक़े भी।।
न जाने क्यों ख़ुद को ख़ुश देखने को तरसने लगी हूं।।
बचपन बीत गया क़िस्से सुनते सुनते ज़िंदगी के।।
न जाने क्यों अब ख़ुद ही क़िस्से लिखने लगी हूं।।
कवियित्री/ लेखिका –
श्रीमति मधु शुभम पांडे
माचीवाड़ा, छिन्दवाड़ा (म प्र)

