Category: विचार
गाँव की सादगी एवं सुखद जीवन की एक पुरानी झलक
Article, 19 Aug 2025 – गाँव का जीवन जहाँ सादगी की झलक हैं, अपनापन के रंग हैं और रिश्तों की मिठास की अनमोल चमक है। जब हम अपने बचपन की स्मृतियों में झांकते हैं तो सबसे पहले आँखों के सामने वही कच्चे घर उभर आते हैं, जिसमे मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छत, आँगन में…
स्कूल का प्रथम दिन- बच्चों के लिए नई दुनिया की ओर पहला कदम जहाँ शुरू होता है जीवन का पाठ
Article/Shyam Kumar Kolare (यक्ष-प्रश्न) 30 जून 2025- ग्रीष्मकालीन अवकाश के पश्चात जैसे ही स्कूल पुनः खुलते हैं, एक नई उमंग, उत्साह और उल्लास का वातावरण निर्मित होता है। विशेष रूप से यह दृश्य जून के मध्य में अधिक देखने को मिलता है, जब गर्मी की लंबी छुट्टियों के बाद विद्यालयों में बच्चों की चहचहाहट और…
पारंपरिक खेल: शारीरिक, मानसिक एवं संज्ञानात्मक विकास का आधार
Article (यक्ष-प्रश्न) 14 जून 2025– मनुष्य के विकास में खेलों की भूमिका सदियों से महत्वपूर्ण रही है। विशेष रूप से पारंपरिक खेल न केवल मनोरंजन का साधन रहे हैं, बल्कि वे बच्चों और युवाओं के शारीरिक, मानसिक, संज्ञानात्मक, सामाजिक और नैतिक विकास में भी अत्यंत सहायक सिद्ध हुए हैं। परंतु वर्तमान समय में आधुनिकीकरण, शहरीकरण…
Suryakant Chaturvedi – “विश्वास की हार” (कविता)
कविता (यक्ष-प्रश्न) 9 जून 2025– Suryakant Chaturvedi- विश्वास की हार (कविता) भले ही लड़कियां विकास की दौड़ में आगे निकल गईलेकिन विश्वास में वें बहुत पीछे छूट गईवें पीछे छूट गईं हैं..एक बेटी के रूप में एक बहन के रूप मेंएक पत्नी के रूप मेंएक प्रेमिका के रूप मेंशायद यही उनकी सबसे बड़ी हार है..-सूर्यकांत…
Shyam Kumar Kolare- “बेटी की पहली रोटी”
कविता (यक्ष-प्रश्न) 9 जून 2025- Shyam Kumar Kolare- Beti Ki Pehli Roti (श्याम कुमार कोलारे-“बेटी की पहली रोटी” नन्हे हाथों ने पहली बार आटा गूंथा, नन्हे हाथों ने आज रोटी बनाई है। आज बेटी ने बाबा के लिए पहली बार स्नेह से रोटी सजाई है। कुछ छोटी, कुछ बड़ी रोटी है, कुछ गोल, कुछ मोटी…
“मेरे सपनों का 2047 का भारत”
प्रस्तावना- भारत जो कि विश्व में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाले देश के रूप में जाना जाता है। शायद इसलिये ही इसे “युवा भारत” कह कर पुकारा जाता है। आज विश्व में भारत अपनी युवा ऊर्जा के साथ विकास के पायदान पर लगातार आगे बढ़ रहा है। क्षेत्र भले ही कोई भी हो भारत का हर…
कविता : सुरसा बनी महँगाई
महँगाई फलफूल रही जकड़ रही है देश को नए- नए रूप में आकर बदल रही है वेश को हर जगह महँगाई की मार तोड़ रही कमर को खाने को सोचने लगे है महँगा हुआ राशन जो। किसान को तो खाद के मांदे आधी हुई कमाई हर चीज की दुनी कीमत सुरसा बनी महँगाई मिट्टी भी…
कविता – “आंखों का नूर”
पथराई अखियन से देखे नूर कहीं जैसा चला गया आस भरी निगाहों से ये प्रीत ममता का वह गया। कलेजे का टुकड़ा बिछडा बहुत दिन गए हैं बीत याद बसायें मन में सारी दिल में उमड़ रही है मीत। कही दूर बसाकर अपना देश प्रीत ने बनाया अलग सा वेश चमक भरी गलियाँ भुला गई…
“एक ऐसा भी करवा चौथ”
साहित्य- सुबह जल्दी उठकर पुष्पा अपने दैनिक काम में लग गई । आज सोचा था कि दोपहर के पहले सब काम निपटकर थोड़ी देर आराम करेगी। दिनभर निर्जला निराहार व्रत जो रखना है उसे आज। हाँ! पिछले आठ साल हो गए है उसे यह व्रत करते हुए । आज सुहागिन महिलाओं का बड़ा कठिन लेकिन…
कविता : चुभता शूल
कहीं धुँआ तो कहीं जहर है हर तरफ देखो मचा कहर है सब अनजाने ये कैसा शहर है भीड़ बड़ी पर अकेला पहर है। मची रही हर तरफ लूटम लूट है इसकी मानो मिली खुली छूट है सस्ती हुई महँगी ये चर्चा आम है दूध में मिले पानी सरल काम है। लूट की देखो ये…
