Home » Bhopal » Page 4

कविता- दर्पण

दर्पण नही छुपाता है, सीधी सच्ची बात जैसी है तस्वीर सामने,वही अक्स लाता इसके सामने झूठ, कभी नही टिक पाता अपने इस गुण से,  है सज्जन कहलाता। भाव सबके पहचाने, है दुःख इसे न भाता खुश में खुश हो जाये, चमक और बढ़ाता देख मुखड़ा दर्पण में, बाला खुश हो जाये सामने इसके रहने, मन…

कविता- सच्चा दोस्त

हर सुबह के बाद एक अच्छी शाम होना चाहिए,  जीवन में अपना एक सच्चा दोस्त होना चाहिए, दोस्त के संग  भावना की  सौगात होना चाहिए, जीवन में अपना एक सच्चा दोस्त होना चाहिए। मस्ती की बारिश में खुशियों के छीटे होना चाहिए, दोस्ती की रिमझिम बारिश में भी भीगना चाहिए, जीवन में नई उमंग दोस्तो…

कविता- महंगाई

खूब बढ़ रही महंगाई गरीबी बढ़ती जाए  हाय महंगाई तुझको क्या शर्म भी ना आए  मिट्टी की दीवारें, फूस छत जैसी की तैसी मैया का चश्मा है टूटा, वो सुधरा न जाए खाट सुतली भी टूटी, चादर सुकड़ा जाए खूब बढ़ रही महंगाई गरीबी बढ़ती जाए।। मशीनें है हाथ घटाते नहीं देते किसी का साथ …

कविता- “सुकून”

भले ही हो आपके पास खूब सुविधाएँ पर जिंदगी में सही सुकून कहाँ से लाएँ। धन-दौलत आराम का समान देता है पर सुकून तो अपने मन मे ही होता है। जरूरत पर हर चीज बड़ी सुहाती है भूख में सुखी रोटी लजीज हो जाती है। आराम गरीबों की खटिया में भी होता है संतुष्टि की…

गाँव का मड़ई मेला

लघु कथा – दीपावली की छुट्टी में, मैं “मिश्री” अपने मम्मी-पापा के साथ दीपावली मनाने के लिए दादा-दादी के घर छिंदवाड़ा जाने के लिए बहुत उत्साहित थी। हम मम्मी-पापा के साथ भोपाल में रहते थे; अपने दादा के घर तीज त्यौहार एवं कोई अनुष्ठान में जाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। इस बार दीपावली…

कविता – मिट्टी का नन्हा दीपक

एक नन्हा सा दीपक मिट्टी का, रखे सदा समर्पण भाव   अंत समय तक जलता रहता, लगा देता है जीवन दाव मिट्टी का दिया बोला हवा से, बहुत ताकत है तेरे अन्दर हम दोनों गर मिल जाये, जहान बनादे स्वर्ग सा सुन्दर।   मैं दीपक देता मंद प्रकास हूँ , हवा देती सबको प्राण  …

कविता : सुरसा बनी महँगाई

महँगाई फलफूल रही  जकड़ रही है देश को नए- नए रूप में आकर बदल रही है वेश को हर जगह महँगाई की मार तोड़ रही कमर को खाने को सोचने लगे है महँगा हुआ राशन जो। किसान को तो खाद के मांदे आधी हुई कमाई हर चीज की दुनी कीमत सुरसा बनी महँगाई मिट्टी भी…

कविता – “आंखों का नूर”

पथराई अखियन से देखे नूर कहीं जैसा चला गया आस भरी निगाहों से ये प्रीत ममता का वह गया। कलेजे का टुकड़ा बिछडा बहुत दिन गए हैं बीत याद बसायें मन में सारी दिल में उमड़ रही है मीत। कही दूर बसाकर अपना देश प्रीत ने बनाया अलग सा वेश चमक भरी गलियाँ भुला गई…

कविता: “पैसा की खनक”

पैसा की खनक मानो किस्मत चमक जाती है पावन खुशबू से इसके फिजायें महक जाती है धन-वैभव सुख-समृद्धि की ठाव बन जाती है मान प्रतिष्ठा के संग जीवन शक्ति में  लाती है। पैसा जिसके पास उसी के पास पैसा आता है पैसा मानो चुम्बक है  पैसा खीच कर लाता है पैसा नही भगवान ये गजब…

कविता – “लिवाज”

लिवाजो की चमक-दमक, इसमे सब शान ढूंढ़ते है कीमती लिवाजो में अक्सर, खुद की पहचान ढूढ़ते है। इंसान लिवाज से नही, क़ाबलियत से जाना जाता है हुनर ज्ञान ही उसे खुद की, सही पहचान दिलाता है। बेजान मूर्ति को दुकानों पर, सजे अक्सर देखा होगा लिवाज उन मूरतों में केवल, चकाचौंध लाता होगा।   साधारण…