अब मत सरकाओ सरकार, आफत बनी है महगाई,
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पहले भी तो आग लगाईं, अब फिर से ले रही अंगडाई,
नून तेल सब महगे हो गए, महंगी हुई साग की कढ़ाई,
अब तो रहम करो सरकार, चुभन लगी फटी चटाई lबच्चों का स्कूल है छूटा, झोपडी का छप्पर भी टूटा,
अन्दर पड़ी हुई है खाट, पाया बंधा हुआ एक खूटा,
दलिया भी हुई अब पतली, स्वाद हुआ अब सीटा,
बस साँसें चल रही सरकार, महगाई ने खूब है कूटा lसूरज दमकता सिर पर हमारे, चाँद आये जब घर,
करू दिहाड़ी करम का मानो, नहीं भरता रोज कर,
महीना में आधे दिन काज, कठिन हो रहा गुजर-बसर,
अब तो रोज काम दो सरकार, राशन नहीं है मेरे घर lमुन्नी अब सायानी हो गई, करना है अब पीला हाथ,
छोटी कमाई बड़ी महगाई, कैसे मिलेगा इसका साथ,
बहुत मिन्नत से शादी जमाई, अब महगी हो गई भाथ,
अब तो रहम करो सरकार, कैसे तिलक लगेगा माथ l

लेखक / कवि –
श्याम कुमार कोलारे
सामाजिक कार्यकर्ता
चारगांव प्रहलाद, छिंदवाड़ा (म.प्र.)
