कविता - "उम्मीद का दीया" – Yaksh Prashn – Shyam Kumar Kolare
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कविता – “उम्मीद का दीया”

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हर अंधेरी रात के बाद, नया सबेरा आता है

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मन में सभी के,उम्मीद का दिया जलता है।

सूरज की गर्मी से चलती, दिनचर्या है आगे

शाम ढले जब आये रात,उजाला जब भागे।

उम्मीद बढ़ाती जिंदगी,रोज सुबह की आस

सुबह सबेरे चल पड़े , आये प्राण में  साँस। 

रोज सबेरे नन्ही चिड़िया,अपनी चहक लगती

अपनी से सबको उठता , मुर्गा बांग लगाता। 

उम्मीद से दुनिया है चलती, जीवन की कुंजी

उम्मीद का दिया जलाये,बनाये बड़ी पूँजी।

रोज सबेरे सूरज आता, नई उम्मीद जगाने 

अपनी ऊर्जा से शक्ति देता, जीवन को सजाने।

हर माता पूत पालती, उम्मीद का दिया जलाने

बड़ा होकर सहारा बने, बुढ़ापा को सहाराने। 

उम्मीद की हर नींद तो, नई ताजगी लाती है 

जीवन के रस लेने को, नई उम्मीद जगती है। 

उन्नति का शिखर पाने, परिश्रम काम आता है

उम्मीद का दिया न बुझे,श्या ध्यान लगाना है। 

कवि / लेखक –
श्याम कुमार कोलारे
सामाजिक कार्यकर्ता
चारगांव प्रहलाद, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)
#ShyamKumarKolare