गाँव की सादगी एवं सुखद जीवन की एक पुरानी झलक – Yaksh Prashn
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गाँव की सादगी एवं सुखद जीवन की एक पुरानी झलक

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Article, 19 Aug 2025 – गाँव का जीवन जहाँ सादगी की झलक हैं, अपनापन के रंग हैं और रिश्तों की मिठास की अनमोल चमक है।

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जब हम अपने बचपन की स्मृतियों में झांकते हैं तो सबसे पहले आँखों के सामने वही कच्चे घर उभर आते हैं, जिसमे मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छत, आँगन में फैली ठंडी मिट्टी और दरवाज़े पर टंगी गोबर-से लिपी हुई सुंदर चित्रकारी।

यह वह संसार था, जिसने हमें जीवन के असली सुख और आत्मीयता का पाठ पढ़ाया। बड़ा परिवार, घर के मुखिया दादाजी थे, और उनके नेतृत्व में सब—चाचा, बुआ, माँ, पिताजी और बच्चे—एक ही घर में रहते थे। घर का हर कोना जीवन से भरा रहता।

सुबह होते ही दादी चूल्हे पर आग सुलगातीं, जिसकी खुशबू पूरे आँगन को महका देती। माँ और बुआ कुएँ से पानी भरकर लातीं, तो चाचा बैल लेकर खेत की ओर निकल जाते।

यह सब एक साथ होता और घर मानो किसी उत्सव-स्थल जैसा लगता। गर्मी की रातों में हम बच्चे आँगन में बिछी चारपाई पर लेटकर तारे गिनते। दादी कहानी सुनातीं—कभी परियों की, कभी वीर राजाओं की।

उनकी आवाज़ सुनते-सुनते नींद आ जाती और सपनों में वही कहानियाँ सजीव हो उठतीं। सर्दियों में मोटी “पल्ली” के नीचे पूरा परिवार दुबककर सोता। ठंडी हवा बाहर चलती रहती, पर अंदर रिश्तों की गर्माहट हमें ढक लेती थी।गाँव का जीवन केवल परिवार तक सीमित नहीं था।

पड़ोसी भी अपने जैसे ही थे। जब किसी के घर शादी होती, तो पूरा गाँव जुट जाता। ढोलक की थाप पर औरतें सुआ गीत गातीं, तो मानो हवा भी गुनगुनाने लगती।

दादरा-सजनई और मंडल गीतों की लय में रातें कट जातीं। होली पर ढोलक की थाप में थिरकते पैर, दीवाली पर मिट्टी के दीयों की कतारें आँगन को चमकातीं, और मकर संक्रांति पर रंग-बिरंगी पतंगें आसमान को भर देतीं। गाँव के मेले तो बचपन का स्वर्ग थे।

मेले में खोवा की जलेबी की खुशबू, झूले की ऊँचाई, मिट्टी के खिलौनों की दुकानें और लोक कलाकारों का नाच-गान आज भी आँखों के सामने घूम जाता है। मेले में बैलगाड़ियों की कतारें, बाँसुरी की मधुर धुन और कहीं दूर से आती नगाड़ों की आवाज़, सब मिलकर गाँव को उत्सव-धाम बना देते।

गाँव का बचपन खेलों से रंगा हुआ था। गिल्ली-डंडा, कंचे, कबड्डी, रस्सी कूद, लुका-छिपी, चोर-सिपाही—हर खेल में दोस्ती और भाईचारा झलकता। जीत-हार पर झगड़ा तो होता, लेकिन वह नाराज़गी अगले ही पल हँसी में बदल जाती। जब बच्चे खेलते तो पूरा गाँव मानो उनके साथ जुड़ जाता। कोई पेड़ की छाँव से देखता, कोई तालियाँ बजाता, तो कोई बच्चों को उत्साह बढ़ाने वाले शब्द कहता।

गाँव की असली पहचान उसके खेत-खलिहान थे। सुबह-सुबह बैलों की घंटियाँ बजतीं और किसान हल लेकर निकल पड़ते। खेतों की हरियाली दूर तक फैली रहती। धान की लहलहाती बाली और गेहूँ की सुनहरी बालियाँ हवा में झूमतीं तो मन खुद-ब-खुद गुनगुनाने लगता। घर के पीछे की बाड़ी भी कम ख़ास नहीं थी। वहीं से ताजे टमाटर, बैंगन, लौकी और मिर्चियाँ तोड़कर लाए जाते। दादी जब इन सब्जियों से खाना बनातीं तो उसकी सुगंध दूर तक फैल जाती। गाँव का कुआँ या झिरिया का पानी इतना मीठा होता कि लगता उसमें मिश्री घुली हो।

गाँव की सुबह का अपना ही संगीत था। सूरज की पहली किरण के साथ मुर्गे की बाँग, बैलों की टुनकती घंटियाँ और पेड़ों पर बैठे पक्षियों का कलरव। यह सब मिलकर एक ऐसी लय बना देता जो आत्मा को सुकून देती। शाम होते ही जब सूरज ढलता और आसमान लालिमा से भर जाता, तो लगता जैसे कोई चित्रकार अपनी तूलिका से रंग बिखेर रहा हो। चौपाल पर बड़े-बुजुर्ग बैठते, बीड़ी सुलगाते और जीवन की कहानियाँ साझा करते। बच्चे वहीं खेलते और बुजुर्गों की डाँट में भी अपनापन छिपा रहता। गाँव की यह सामूहिकता हमें हमेशा याद दिलाती कि “हम” का भाव “मैं” से कहीं बड़ा है।

गाँव की सबसे बड़ी पूँजी थे हमारे बुजुर्ग। दादी-नानी के घरेलू नुस्खे हर बीमारी का इलाज थे। दादा-नाना की कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि जीवन की गहराइयों से परिचय करातीं। उनकी डाँट भी स्नेह से भरी होती थी, जो हमें सही राह दिखाती। बड़े बच्चों पर छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी होती। इसी से बचपन से ही हममें कर्तव्यबोध और सहयोग की भावना विकसित होती।

परिवार का हर सदस्य दूसरे की चिंता करता, और यही अपनापन पूरे गाँव तक फैला हुआ था। आज जब शहर की भाग-दौड़ और चकाचौंध देखता हूँ, तो गाँव का वह जीवन किसी मीठे सपने जैसा लगता है। यहाँ ए.सी., गाड़ियाँ और पक्के मकान तो हैं, पर न तो वह मिट्टी की खुशबू है और न रिश्तों की गर्माहट। लोग एक ही छत के नीचे रहकर भी अकेलेपन से जूझ रहे हैं।

वह कच्चा घर, दादी की कहानियाँ, त्योहारों की रौनक, मेले की धूम, बाड़ी के ताजे फल, कुएँ का मीठा पानी और गाँव के खेल—ये सब अब केवल यादों का खजाना हैं। समय भले लौटकर न आए, पर वे स्मृतियाँ आज भी मन को सुकून देती हैं। काश, कोई लौटा दे वह सुनहरे दिन, जब रिश्तों की मिठास, लोकगीतों की गूंज, खेतों की हरियाली और मिट्टी की खुशबू ही जीवन का सबसे बड़ा सुख हुआ करती थी।

Shyam Kumar Kolare

Shyam Kumar Kolare

सामाजिक कार्यकर्ता, एवं स्वतंत्र लेखक

छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश

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